यह फैसला न केवल एक परिवार की जीत है, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनके अपनों ने महामारी में ड्यूटी निभाते हुए जान गंवाई।
डिजिटल डेस्क न्यूज़/जबलपुर। कोविड-19 महामारी के उस काले दौर को याद कीजिए, जब पूरा देश लॉकडाउन की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। हजारों प्रवासी मजदूर पैदल घर लौटने को मजबूर थे, अस्पतालों में बेड की कमी थी, और मौत का साया हर तरफ मंडरा रहा था। ऐसे में, राज्य सरकार के कर्मचारी, जिन्हें हम ‘कोविड योद्धा’ कहते हैं, ने अपनी जान की परवाह किए बिना दिन-रात सेवा की। लेकिन कई मामलों में, इन योद्धाओं की शहादत के बाद उनके परिवारों को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पाया, क्योंकि तकनीकी कारणों जैसे कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट की कमी आड़े आ गई। अब, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने एक क्रांतिकारी फैसले से इस अन्याय को दूर कर दिया है। यह फैसला न केवल एक परिवार की जीत है, बल्कि उन सभी परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनके अपनों ने महामारी में ड्यूटी निभाते हुए जान गंवाई।
यह मामला स्वर्गीय राजीव उपाध्याय का है, जो जिला कलेक्टरेट, जबलपुर में असिस्टेंट ग्रेड-3 के पद पर कार्यरत थे। उनकी पत्नी अंजू मूर्ति उपाध्याय ने उच्च न्यायालय में याचिका (W.P. No. 18400/2020) दायर की थी, और अदालत ने 18 सितंबर 2025 को अपना ऐतिहासिक आदेश पारित किया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘मुख्यमंत्री कोविड-19 योद्धा कल्याण योजना’ के तहत लाभ के लिए मृतक कर्मचारी की कोविड-19 पॉजिटिव टेस्ट रिपोर्ट अनिवार्य नहीं है, यदि मौत ड्यूटी के दौरान हुई हो। यह निर्णय उन परिवारों के लिए बड़ा सहारा बनेगा, जिन्हें पहले ऐसे तकनीकी आधार पर लाभ से वंचित किया गया था। आइए, इस फैसले की पूरी कहानी, उसके प्रभाव और कैसे प्रभावित परिवार लाभ उठा सकते हैं, विस्तार से समझते हैं।
जानिए ये है पूरी कहानी
कोविड-19 महामारी का पहला दौर (अप्रैल-जून 2020) देश के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण समय था। पूर्ण लॉकडाउन के कारण रेल, हवाई और सड़क परिवहन ठप थे। लाखों प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर थी। जबलपुर जिले में, राजीव उपाध्याय जैसे कर्मचारी इस जिम्मेदारी को निभाने में जुटे हुए थे। उपाध्याय जी पर प्रवासी मजदूरों के लिए बसों और एम्बुलेंस की व्यवस्था सुनिश्चित करने का दायित्व था। यह काम आसान नहीं था – दिन-रात की ड्यूटी, लगातार तनाव, और संक्रमण का खतरा।
10 जून 2020 को, इसी ड्यूटी के दौरान उन्हें अचानक हृदयाघात हुआ। अस्पताल पहुंचने पर उनका निधन हो गया। परिवार ने ‘मुख्यमंत्री कोविड-19 योद्धा कल्याण योजना’ के तहत अनुदान मांगा, लेकिन सरकार ने यह कहकर इनकार कर दिया कि मौत कोविड संक्रमण से नहीं हुई थी, क्योंकि पॉजिटिव रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी। योजना के नियमों में तब यह शर्त थी कि लाभ के लिए कोविड पॉजिटिव होना जरूरी है। परिवार ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिला।
कोर्ट का फैसला: सेवा को सर्वोपरि माना गया
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पुराने सरकारी आदेश (दिनांक 28 अक्टूबर 2020) को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया:
मृत्यु का कारण और योजना की पात्रता: कोर्ट ने माना कि राजीव उपाध्याय की मौत सीधे तौर पर कोविड-19 नियंत्रण संबंधी दबावपूर्ण ड्यूटी के दौरान हुई। महामारी के समय ऐसी ड्यूटी में लगे कर्मचारी ‘कोविड योद्धा’ माने जाते हैं, और उनकी मौत को योजना के दायरे में लाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सेवा ही सबसे बड़ा प्रमाण है, न कि कोई रिपोर्ट।पॉजिटिव रिपोर्ट की अनिवार्यता समाप्त: यह फैसला सबसे महत्वपूर्ण है। अब, यदि मौत ड्यूटी के दौरान हुई हो, तो कोविड-19 पॉजिटिव टेस्ट रिपोर्ट प्रस्तुत करना जरूरी नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महामारी के दौरान काम का तनाव, थकान और जोखिम खुद में मौत का पर्याप्त कारण हो सकता है, भले ही संक्रमण की पुष्टि न हुई हो। यह उन मामलों में राहत देगा जहां टेस्ट नहीं हो पाया या रिपोर्ट निगेटिव आई, लेकिन मौत ड्यूटी से जुड़ी थी।
अनुदान का भुगतान: कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अंजू मूर्ति उपाध्याय को योजना के तहत पात्र अनुदान राशि (जो आमतौर पर 50 लाख रुपये तक होती है, लेकिन सटीक राशि योजना के नियमों पर निर्भर) 90 दिनों के भीतर जारी की जाए। साथ ही, संबंधित विभागों (जैसे सामान्य प्रशासन विभाग, स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन) को आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया।
यह फैसला कानूनी रूप से बाध्यकारी है और राज्य भर में इसी तरह के मामलों के लिए मिसाल बनेगा।
योजना का विवरण: क्या है ‘मुख्यमंत्री कोविड-19 योद्धा कल्याण योजना’?
मध्यप्रदेश सरकार ने 2020 में यह योजना शुरू की थी, ताकि कोविड-19 ड्यूटी में लगे कर्मचारियों (सरकारी, अर्ध-सरकारी, संविदा आदि) की मौत पर उनके परिवारों को आर्थिक सहायता मिले। मुख्य विशेषताएं:
पात्रता: राज्य सरकार के कर्मचारी जो कोविड-19 नियंत्रण, उपचार, या संबंधित कार्यों (जैसे प्रवासी मजदूरों की मदद, क्वारंटाइन व्यवस्था आदि) में लगे थे। मौत ड्यूटी के दौरान या उसके परिणामस्वरूप हुई हो।
ये है लाभ: अनुदान राशि (आमतौर पर 50 लाख रुपये), साथ ही अन्य सुविधाएं जैसे पेंशन, नौकरी आदि (नियमों के अनुसार)।
आवश्यक दस्तावेज: मौत का प्रमाण-पत्र, ड्यूटी प्रमाण-पत्र (जिला कलेक्टर या विभाग से), परिवार का विवरण। अब, कोर्ट के फैसले के बाद पॉजिटिव रिपोर्ट की जरूरत नहीं।
आवेदन प्रक्रिया: जिला कलेक्टर या संबंधित विभाग में आवेदन करें। यदि अस्वीकृति हो, तो उच्च न्यायालय में याचिका दायर की जा सकती है।
प्रभाव: परिवारों के लिए नई उम्मीद
यह फैसला मध्यप्रदेश के हजारों परिवारों के लिए बड़ा वरदान साबित होगा। महामारी में करीब 500 से अधिक सरकारी कर्मचारियों ने जान गंवाई, लेकिन कई परिवार तकनीकी कारणों से लाभ से वंचित रहे। अब:
कैसे लाभ उठाएं? यदि आपका कोई परिजन (राज्य सरकार का कर्मचारी) कोविड-19 ड्यूटी में मौत का शिकार हुआ, तो,ड्यूटी संबंधी प्रमाण-पत्र जुटाएं (विभाग से)।मौत का कारण ड्यूटी से जुड़ा साबित करें (मेडिकल रिकॉर्ड, गवाह आदि)जिला प्रशासन में आवेदन करें। यदि अस्वीकृति हो, तो हाईकोर्ट जाएं, इस फैसले का हवाला दें (W.P. No. 18400/2020)।समय सीमा: योजना के नियमों में आवेदन की कोई सख्त समय सीमा नहीं, लेकिन जल्दी करें।सहायता: कानूनी सहायता के लिए बार एसोसिएशन या एनजीओ से संपर्क करें। सरकार को अब ऐसे सभी लंबित मामलों की समीक्षा करनी चाहिए।
आपका हक है
यह फैसला साबित करता है कि न्याय व्यवस्था योद्धाओं के बलिदान को नहीं भूलती। राजीव उपाध्याय जैसे हर योद्धा को सलाम, और उनके परिवारों को न्याय। यदि आप प्रभावित हैं, तो तुरंत कार्रवाई करें – यह आपका हक है।



















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