धार्मिक शहरों में बीजेपी के लिए चिंता का विषय बना एसआईआर
एसआईआर यानी मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण। इस वक्त संसद से लेकर सड़क तक चर्चा का विषय बना
डिजिटल डेस्क न्यूज़। एसआईआर के ऐलान के बाद से जहां घुसपैठियों की नींद उड़ी हुई है, वहीं इससे हिंदू धर्म के साधु सन्यासी भी परेशान हैं। इसके पीछे का कारण है मां के नाम का खाली कॉलम।चुनाव आयोग की एसआईआर ने किया अयोध्या, मथुरा और वाराणसी के साधु संतों को परेशान। धार्मिक शहरों में बीजेपी के लिए चिंता का विषय बना एसआईआर, कटने की कगार में साधु संतों का नाम। माता सीता, जानकी, कौशल्या और सुमित्रा के नाम अब दूर करेंगे साधु सन्यासियों की चिंता। एसआईआर यानी मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण। इस वक्त संसद से लेकर सड़क तक चर्चा का विषय बना हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश में एसआईआर की अंतिम तारीख को 11 दिसंबर से बढ़ाकर 26 दिसंबर करना बीजेपी के लिए एक राहत की खबर साबित हुई है। वाराणसी, मथुरा, वृंदावन और अयोध्या जैसे धार्मिक शहरों में साधु संतों और सन्यासियों तक पहुंचना और उनसे एसआईआर फॉर्म भरवाना एक कठिन प्रक्रिया साबित हो रही है।
माता-पिता के नाम के स्थान पर ये लिख रहे
अयोध्या में भाजपा के पूर्व सांसद और विश्व हिंदू परिषद के नेता रामविलास वेदांती ने अपने माता-पिता के नाम के स्थान पर जानकी दिया जो भगवान राम की पत्नी सीता का दूसरा नाम है। वेदांती अकेले नहीं है ऐसे। इसमें दिगंबर अखाड़ा के महामंडलेश्वर प्रेम शंकर दास भी शामिल हैं। इसके अलावा कई और साधु अपनी माताओं के नाम की जगह पर जानकी, सीता या फिर कौशल्या लिख रहे हैं। फॉर्म में माता का नाम वाला कॉलम खाली छोड़ देंगे तो उनका फॉर्म मतदाता सूची से हट सकता है। साधु सन्यासियों ने अपने आधिकारिक पहचान पत्रों पर अपने आध्यात्मिक गुरु का नाम पिता के रूप में दर्ज कराते हैं क्योंकि वह सांसारिक जीवन को त्याग चुके होते हैं। वह अपनी माता का नाम भी इसलिए नहीं लिखते हैं। मंदिरों और आश्रमों के प्रमुखों से लगातार किया जा रहा संपर्क
इस मामले पर महामंडलेश्वर प्रेमशंकर दास ने बताया कि अयोध्या स्थित उनके आश्रम सिद्धपीठ रामधाम में 12 मतदाता हैं,लेकिन उनमें से आधे धार्मिक यात्राओं के सिलसिले में यात्रा पर हैं। उन्होंने कहा कि बूथ स्तरीय अधिकारी अभी तक उनके एसआईआर फॉर्म नहीं दे पाए हैं।




















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