अब नहीं गूंज रही दहाड़, हिंसक संघर्ष में हुई मौत, पुजारी के किस्से हमेशा रहेंगे याद
बीती 11 मई को वह बांधवगढ़ के खितौली रेंज में ही एक अन्य बाघ के साथ हिंसक टकराव में गंभीर रूप से जख्मी हो गया। जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई।
Report by-Rahul Dubey
डिजिटल डेस्क न्यूज/भोपाल। अब नहीं गूंजेगी बांधवगढ़ के खितौली रेंज में “पुजारी” की दहाड़। वह शहंशाह सी चाल, वह अठखेलियां अब सिर्फ यादें रह गईं, क्योंकि नहीं रहा पुजारी, अब मंदिर की चौखट वह पट्टी भी सूनी हो गई जहां बैठता था कभी पुजारी….।

दरअसल, बांधवगढ़ की पहचान बन चुका पुजारी टाइगर अब नहीं रहा। उल्लेखनीय है कि बीती 11 मई को वह बांधवगढ़ के खितौली रेंज में ही एक अन्य बाघ के साथ हिंसक टकराव में गंभीर रूप से जख्मी हो गया। जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई। पुजारी, वन्य प्रेमियों को हमेशा के लिए दुःखी कर अलविदा कह गया।
बांधवगढ़ घूमने आने वाले सैलानियों को पुजारी हमेशा याद रहेगा, उसकी चहल-कदमी और घंटों तक पर्यटकों को जिप्सी के आगे धीरे-धीरे चलना जैसे वह कैमरा फ्रेंडली हो, एक से बढ़कर एक अंदाज में पोज देना और अपने दीदार कराना उसकी खूबियों में शामिल था। इतना ही नहीं मादा बाघिन तारा के साथ पानी के डबरों और जलाशयों के किनारे बैठकर अठखेलियां खेलना।
जंगल के अंदर अलग ही तस्वीरों को उकेरता था, एक अलग ही रोमांच पैदा करता था। अक्सर इन पलों को अपने कमरे में कैद करने के लिए वाइल्ड लाइफ फटॉग्रफर्स और पर्यटक बेताब रहते थे। बांधवगढ़ के जंगल में शहंशाह की भांति पुजारी का टहलना, जंगल के अंदर स्थित मंदिर के आस पास ज्यादातर समय व्यतीत करना, यही वजह रही की अपने पूरे जीवन काल में यह टाइगर पुजारी के नाम से ही पहचाना गया।
ऐसे अनेकों किस्से हैं जो अब पुजारी टाइगर को लेकर पर्यटकों और वन्यप्रेमियों की यादों में सिमटे रहेंगे। टाइगर देखने आने वाले पर्यटकों को किसी प्रकार की तकलीफ दिए बगैर दीदार करना उसकी सबसे बड़ी खूबी थी। अब पुजारी के दुनिया से चले जाने के बाद वन्य प्रेमियों के साथ-साथ बांधवगढ़ वन प्रबंधन और प्रशासन को भी पुजारी की कमी बेहद खल रही है। अलविदा पुजारी..।




















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